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जो कुछ भी मैं लिखता हूँ तुम खुद आके लिखबाती हो....

Posted On: 22 Jun, 2014 Others,कविता,Hindi Sahitya में

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जो कुछ भी मैं लिखता हूँ तुम खुद आके लिखबाती हो।
माना हमसे दूर सही पर इस दिल मे रह जाती हो।
शब्दों की तुम रेखा हो मन के तार बजाती हो।
मैं नही स्वयं कुछ लिखता हूँ तुम खुद कविता बन जाती हो।
जो कुछ भी मैं लिखता हूँ तुम खुद आके लिखबाती हो।
मेरी साँसों संग तुम चलती हो।
मेरे जीवन संग तुम बढ़ती हो।
मेरे होंठो से तुम हँसती हो।
मेरी आँखों मे दिख जाती हो।
जो कुछ भी मैं लिखता हूँ तुम खुद आके लिखबाती हो।
मै किरण बनूँ या रवि बन जाऊँ।
मै गीतकार या कवि बन जाऊँ।
मै कितने भी आयाम गढ़ू।
पर रस्ते तुम्ही बनाती हो।
जो कुछ भी मैं लिखता हूँ तुम खुद आके लिखबाती हो।



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5 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sanjeevtrivedi के द्वारा
November 9, 2014

धन्यवाद राजीव जी…

Alka के द्वारा
February 16, 2015

संजीव जी सुन्दर प्रेमाभिव्यक्ति .. सुन्दर रचना ..

sanjeevtrivedi के द्वारा
March 13, 2015

धन्यवाद आपका…..

sanjeevtrivedi के द्वारा
March 13, 2015

धन्यवाद अलका जी


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