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चाँद चाँदनी बरसाता है सूरज धूप बिखेरा करता.....

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चाँद चाँदनी बरसाता है सूरज धूप बिखेरा करता.
पर तू प्रेम सुधा बरसाती
जिससे मिलती मुझे अमरता।
चाँद रोज तारो मे आता
सूरज आँगन मे आ जाता
पर तू कहाँ रहा करती है मेरी आँखो की चंचलता।
चाँद कही जब खो जाता था
सूरज बादल मे छिप जाता
फिर मेरा मन डरने लगता
जब वसुधा पर तिमिर बिखरता
ऐसे मे तुम आ जाती थी
बन के सुन्दरता की प्रतिमा
अपलक मै निहारता रहता तेरी सुन्दरता और गरिमा।



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति आभार..

sanjeevtrivedi के द्वारा
February 23, 2014

शिल्पा जी आपका धन्यवाद जो आपने अपना कीमती समय हमारी रचना को दिया… आगे भी प्रोत्साहित करती रहियेगा….


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